जानता हूँ मैं कि तुम अब
नहीं हो
कभी कभी
संशय की मज़बूत जड़ें उतर जाती है
मन की उपजाऊ ज़मीन में
और कहती है कि मैं भी
अब नहीं हूँ
होता है जब ऐसा
तो फैंकता हूँ मैं
स्मृतियों का जाल
जिसमें फँस जाती है
तुम्हारी
मछली की तरह फड़फड़ाती ताम्बई
देह
और दिलाती है एहसास हमारे
होने का
फिर वह जाल स्वयं
समंदर बन जाता है
जिसमें भटकती क़श्ती की तरह
खींचा चला जाता हूँ मैं
दिखता है, दूर हरेभरे द्वीप पर
छोटा सा मकान
जिसकी छत पर रखी है एक
चारपाई
लेटा हूँ मैं उस पर
तारों को निहारते हुए
और तुम आकर बिछाती हो
अपने प्यार की चादर
आह! कितनी मीठी लगती है
चारपाई की रस्सी की चुभन
सूँघता रहता हूँ मैं
गिली मिट्टी की खुशबू सा तुम्हारा मौन
छा जाती है
किसी जलप्रपात से बनी
धुंध जैसी नमी
मेरी देह पर
मैं बोता हूँ प्यार तुम्हारी आत्मा में
यह देखकर
आसमान से उतर आते हैं
कुछ तारें छत पर
मुस्कुराते हैं बडी बेशर्मी से
तब तुम धीरे धीरे
उठती हो उपर
बन जाती हो ध्रुवतारा मेरे लिए
और भटकती क़श्ती जैसे मेरे अस्तित्व को
मिल जाती है दिशा.
क्यों मिल जाती है दिशा?
क्यों बन जाती हो तुम ध्रुवतारा, प्रिये?
क्योंकि तुम नहीं हो?
हाँ, मैं जानता हूँ तुम नहीं हो
यह भी मानने लगा हूँ कि
मैं भी नहीं हूँ
पर प्यार तो है, प्रिये
आखिर प्यार
मासूम प्रेत नहीं तो और क्या है?
इतना जान लो प्रिये कि
जो तुम्हारी आँखों ने कहे थे
उन शब्दों के गर्भ में
सिमटकर बैठे हैं हम अब भी
जिसे गणिका की तरह भोगा था हमने
उस उदासी में
फैले हुए हैं हम अब भी
जिन्हें खुशी के मंत्रोच्चारों से
शाश्र्वत बना दिया था हमने
उन पलों में
धड़क रहे हैं हम अब भी
वह बारिश, वह धूप,
वह दरिया की ताज़गी लेकर आती पवन
जिनको छुआ था हमने
मंत्रमुग्ध होकर
उनमें पलकें मूंदे बैठे हैं हम अब भी.
तो प्रिये
केवल तुम्हारा, या सिर्फ मेरा होना
निरर्थक हो सकता है
लेकिन क्या हमारे होने का अर्थ
जीवन का होना
नहीं है?