पहले जुनून आता था
मछलियों से भरी गाड़ी की तरह
फैल जाती थी उसकी बू
हवाओं में
पर गाड़ी के गुज़र जाने के बाद
हो जाती थी हवाएं साफ-सुथरी
जिसमें फिर सांस लेना संभव हो पाता था.
लेकिन अब
आने लगा है खुशबूदार जुनून
अभिप्रायवर्धक शरबतों की
शकल में.
लाल, हरे और केसरिया शरबत,
जिन्हें पीते ही
कोशिकाओं तक
उतर जाता है जुनून
और फिर मस्तिष्क कटने के बाद ही
लड़ पाते हैं धड़,
और गाते रहते हैं वृंदगान
समाज को बदलने के
अभिव्यक्ति की आज़ादी के
कौमी तिरस्कार के.
पहले तो
शत्रु के मित्र बनने की
संभावनाएं बरकरार रहती थी
लेकिन अब
मित्रों को भी शत्रु बना रही है
ये शरबतों की दुकानें.
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